बचपन में सुनी एक कहानी थी,
एक राजा था एक रानी थी,
राजा रानी के थे दो बच्चे,
मन के थे दोनो ही सच्चे
नन्हा सा था राजकुमार एक
प्यारी सी थी राजकुमारी एक
राजा ने जबसे भागदौड़ संभाली थी
राज्य में हर दिन दिवाली थी
मगर एक अँधेरा दिन ऐसा आया
राजकुमार पर पड़ा राक्षसों का साया
बहला कर उसके मासूम मन को
संग ले गए राक्षस राजकुमार को
परियों ने राजकुमारी का जिम्मा उठाया
उसे पढना और लिखना सिखाया
राजकुमार के जीवन में सूनापन छाया
उस वर्ष राजकुमार को होश आया
लौट आया वो राजा के द्वार
किया उसे प्रेम से रजाने स्वीकार
राज्कुमारने तख़्त-ताज का तोहफा पाया
और रानी ने उसका ब्याह रचाया
छोटी रानी थी परियों सी सुन्दर
मगर द्वेष भरा था मन के अन्दर
छोटी रानी ने राजकुमार के संग
लूट लिया राज्य का हर रंग
धन-दौलत लूटकर चले गए दोनो
राज्य कि दीवारें खोकली कर गए दोनो
राजा-रानी इस हरकत से बौखलाए
दोनो कि आंखों में आंसूं भर आये
निडर राजकुमारी ने तब तलवार उठायी
साहस से हर और उसने खलबली मचाई
धन-दौलत से राज्य फिर जगमगाया
और यौवन से खिल उठी राजकुमारी कि काया
राजा ने तब उसका स्वयंवर रचाया
मगर राजकुमारी को कोई राजकुमार ना भय
एक दिन राज्यपर फिर घनघोर अँधेरा छाया
रानी को ऐसा भयंकर बुखार आया
राजा ने तब राजकुमार को बुलाया
बेटे को देख रानी को होश आया
एक क्षण में रानी ने प्रण त्यागे
झुक गया राजा वक्त के आगे
राजकुमारी ने स्वयं को अकेला पाय
उसने फिर अपनी परियों को बुलाया
रोते मन को उनहोंने हँसना सिखाया
राजकुमारी को परियों ने उड़ना सिखाया
खेतों में छाई फिर से हरियाली
राज्य में आयी फिर से खुश-हाली
शब्दों कि बूंदों से बनी जीवन सरिता
राजकुमारी ने तब लिखी यह कविता
एक खोए बचपन कि कहानी थी
ना कोई राजा था ना कोई रानी थी........
P.S.: This poem was conceptualized and written in bits and pieces over a period of 15 days - the longest I have taken to write anything. It is very close to my heart!
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