Friday, June 15, 2007

सूरज

Sunand called up last night and asked for a poem in Hindi on "Suraj" for his neice to take to school.. Here is what we came up with (not one, but 2 poems in about 20 mins flat!)

This is the one by me.....
उगता हूँ मैं पूरब से
सुबह होती है मुझसे

छिप जाते हैं चांद तारे मेरे कारण
खिलता है सूरजमुखी मेरे कारण

जैसे मैं चलता हूँ पश्चिम की ओर
बनता चलता हूँ मैं रंगों की डोर

डूबने से मेरे होती है संध्या
और खिलकर निकलता है चन्दा

आदित्य, सूरज, सुर्य और रवि
इन नामों से जानते हैं मुझे सभी


This is the one by Ritu...
अँधेरे को दूर भागता
रौशनी की किरणे लाता
सुबह सबेरे रौशनी की सौगात लाता
प्यार से मैं सूरज दादा कहलाता

मेरी रौशनी होते ही, शुरू होता चिड़ियों का गाना
फूलों में भंवरों का आना, सूर्यमुखी के पट खुल जाना

लोगों का काम पर जाना
बच्चों का स्चूल चले जाना
शाम ढले मुझे है छुप जाना
क्योंकि चन्दा मामा को है आना

P.S.: As usual, my poem was written while I was on a 3-hr long marathon call!

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