Tuesday, July 27, 2010

इन्द्रधनुष

रिमझिम गिरी आज ऐसी बरखा ...
जैसे सुनाती हो कोई दास्ताँ ...

एक नन्ही हँसती परी की
उसकी चाँद की चूड़ी की
उसके होंठों की हँसी की
उसकी तारों की बालियों की

सूरज ने कहा मैं पीछे न रहूँगा
कड़ाके की धुप खिलाकर निकला

एक किरण ख़ुशी की
एक किरण रंगत की
एक किरण संगत की
भेजी सूरज ने परी के लिए

तब बादलों ने फिर से छेड़ा मल्हार
गडगडाट से दिया सूरज को ललकार
सूरज ने भी चुनौती स्वीकारी
अपनी किरणे और फैलाई

सूरज की किरणों की तलवार
पर बादलों ने बिजली से किया वार
बोल उठी परी होकर खुश
दोनों मिलकर मेरे लिए क्यूँ नहीं बना लेते इन्द्रधनुष?

P.S.: This is exactly what the weather was like today morning.. a few mins of rain interspersed with a few mins of sunshine.... Thought of the poem while driving to work.. put it to words as soon as i came in to work today...

1 comment:

Neerja said...

wah wah kya baat hai..
nice..