ना जाने क्या हो गया है मुझे
कि फूलों से मुझे महक नहीं आती
और जीवन कि सुन्दरता की
मुझे तारीफ भी नहीं आती
जिंदगी धुंधली सी लगती है
जैसे चारों ओर अँधेरा है
शायद मुझ तक सूरज की
किरणें ही नहीं आती
ना सुर-ताल की चाह बची है
ना सौंदर्य की पहचान बची है
बचे हैं तो बस यह आंसूं
अब मुझे हँसी भी नहीं आती
चाहा था मैने कभी किसीको
उसके प्यार में पागल थी मैं
उसे मिलने को हरपल बेक़रार थी मैं
लेकिन अब तो उसकी याद भी नहीं आती
स्कूल की कुछ झांकियां
कुछ कालेज के पुराने दिन
दिखते थे मुझे सपनों में
लेकिन अब तो मुझे नींद ही नहीं आती
ना जाने क्या हो गया है मुझे......
P.S.: This poem was written one day before my D.S.P. Paper in Sem VII
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